मानव और प्रकृति के मध्य नैतिक संबंध होना नितांत आवश्यक : स्वामी चिदानन्द सरस्वती

ऋषिकेश।


परमार्थ निकेतन में भारत के विभिन्न प्रांतों से एस जी व्ही पी से आये युवाओं के दल ने परमार्थ निकेतन के परमाध्यक्ष स्वामी चिदानन्द सरस्वती से भेंट कर अध्यात्म, धर्म और विज्ञान का समन्वय, सर्वधर्म समभाव, विचारों को नियंत्रित करना, व्यसनों से दूर रहना जैसे अनेक विषयों और आध्यात्मिक जिज्ञासाओं का समाधान प्राप्त किया।
गुजरात उच्च न्यायालय के न्यायाधीश आर.बी. ढोलरिया और कलकत्ता उच्च न्यायालय के न्यायाधीश आर.के. बाग ने स्वामी चिदानन्द सरस्वती से भेंट की। स्वामी चिदानन्द ने दोनों न्यायधीशों और उनके परिवार जनों को रूद्राक्ष का पौधा भेंट किया।
स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने कहा कि ''आज की युवा पीढ़ी जब संकल्प करेगी तो संकल्प से सफलता, स्वच्छता, स्वास्थ्य, समृद्धि और सिद्धि भी मिलेगी। यह स्वच्छता से सृमद्धि का पथ है, यह समृद्धि से सिद्धि का संकल्प है। भारत को नये भारत की ओर ले जाने की एक ही सिद्धि है, वह है युवा। जो नये भारत की सुध दिला दे, स्मृति दिला दे, स्मरण दिला दे और संकल्प करा दे यह काम युवा शक्ति बहुत बेहतर ढ़ंग से कर सकती है। उसी युवा शक्ति ने आज दृढ़ता के साथ संकल्प लिया कि हम अपने गावों, शहरों और प्रदेशों में जाकर संकल्प से सिद्धि के पथ को नयी ऊचाँईयों पर और नयी बुलंदियों पर ले जायेंगे। केवल संकल्प ही नहीं बल्कि हमारा भारत भी शिखर पर आरूढ़ होगा।
स्वामी चिदानन्द ने युवाओं को धर्म और विज्ञान के बारे में समझाते हुये कहा कि 'ईश्वर स्यम् इदम् सर्वम्' अर्थात ईश्वर सर्व है। धर्म और विज्ञान दोनों एक दूसरे के विपरित नहीं बल्कि सहचर है। अल्बर्ट आइंस्टीन ने कहा है कि ''विज्ञान के बिना धर्म लंगड़ा है और धर्म के बिना विज्ञान अंधा है।'' यह कथन धर्म और विज्ञान के मध्य सहजीवी संबंध की व्याख्या करता है। धर्म और विज्ञान दोनों के द्वारा ही मानव का विकास सम्भव है। प्राचीन काल में आर्यभट्ट, सुश्रुत और चरक जैसे कई आध्यात्मिक, वैज्ञानिक थे। उन्होने कहा कि गुरूकुल में शिक्षा प्राप्त करने के साथ विज्ञान का अध्ययन करना भी आवश्यक है।
स्वामी चिदानन्द ने कहा कि आज के युग में पर्यावरणीय नैतिकता बहुत जरूरी है, मानव और प्रकृति के मध्य नैतिक संबंध होना नितांत आवश्यक है तभी हम प्रकृति की रक्षा कर सकते है।


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