विकास भवन : आउटसोर्शिंग से हो गया सभागार व सीडीओ कक्ष का कायाकल्प

शासन से एक धेला नहीं मिला बजट
योगी राज में ताक पर क़ायदे-क़ानून, हद कर दी नौकरशाहों ने
फ़तेहपुर


योगी राज में नौकर शाह शासनादेश को रद्दी की टोकरी में डालकर कार्य कर रहे हैं! मौजूदा सिस्टम से सवाल पर सवाल तो हो रहे हैं किन्तु जवाब शून्य में ही आना जैसे पहले से तय हो गया है! मजाल क्या कि कैसी भी करनी पकड़ में क्यूँ न आ जाये किन्तु ज़िम्मेदार का बाल तक बाँका न होने पाये इसके गारंटर ऊपर तक पूरा सिस्टम सम्भाले हैं! क्या किसी सरकारी भवन या कार्यालय का सुंदरीकरण आउटसोर्शिंग से हो सकता हैं जवाब अधिकारी भी न में देते हैं, किन्तु विकास भवन के सभागार व मुख्य विकास अधिकारी के कक्ष का भारी भरकम धनराशि से काया-कल्प का ज़रिया तत्कालीन सीडीओ चाँदनी सिंह की अगुवाई में सीधे-सीधे “आउटसोर्शिंग” से रहा।
उल्लेखनीय है कि तक़रीबन साढे तीन दशक पुराने विकास भवन की जर्जर हालत को देखते हुए इसके मरम्मतीकरण के लिये ज़िला विकास अधिकारी द्वारा वर्ष 2018-2019 की ज़िला योजना में 40 लाख रुपये की माँग की गई थी किंतु शासन से इस मद में एक धेला भी नहीं मिला। इसी कड़ी में 2019 -2020 की ज़िला योजना में डीडीओ ने पुनः 50 लाख रुपये की माँग की किन्तु इस मद में अब तक एक पैसा प्राप्त नहीं हुआ है। बावजूद इसके विकास भवन सभागार व सीडीओ कक्ष का कायाकल्प हो गया।
उपरोक्त सन्दर्भ में गहनता से पड़ताल करने पर पता चला कि विकास भवन सभागार व सीडीओ कक्ष का कायाकल्प विशुद्ध रूप से आउटसोर्शिंग से हुआ है और इसके लिये कही से सरकारी धन का प्रयोग नहीं हुआ है। इस आउटसोर्शिंग का ताना-बाना तत्कालीन सीडीओ चाँदनी सिंह द्वारा बुना गया था। सूत्रों की माने तो आरईएस के अधिशासी अभियंता और डीआरडीए के सहायक अभियंता को इस काम की जिम्मेदारी सौंपी गई थी और उन्होंने आउटसोर्शिंग से लगभग 22 लाख रुपये जुटा कर सीडीओ मैडम का कक्ष तो सजवाया ही साथ में सभागार को भी अपडेट करा दिया।
 ख़बर है कि इस आउटसोर्शिंग रूपी हवन में आरईएस के 13 कांट्रेक्टरो की फ़र्मों से आहूतिया पड़ी है। सांसद-विधायक निधि समेत विभिन्न प्रकार के निर्माण कार्यों से ताल्लुक़ रखने वाली इन फ़र्मों की कुछ शिकायतें पूर्व में प्रशासन स्तर पर हुई थी, जिनकी जाँच सीडीओ को मिली थी। सूत्र बताते हैं कि आउटसोर्शिंग के हवन में आहुतियाँ डालकर इन फ़र्मों ने अपने-अपने पाप धो डाले।
एक अन्य जानकारी के अनुसार इस आउटसोर्शिंग में जिले के भ्रष्ट विभागों की फ़ेहरिस्त में शामिल ज़िला पंचायत राज अधिकारी कार्यालय की भी आहुति पड़ी हैं।बताते हैं कि डीपीआरओ कार्यालय के एक कर्ता-धर्ता लिपिक के माध्यम से 26 प्रधानो और 19 ग्राम पंचायत अधिकारियों से सम्बंधित आरोपो की पत्रावलियों के पाप भी धुल गये।
यहाँ पर सवाल यह उठता है कि किसी भी सरकारी भवन या बड़े से बड़े अधिकारी के कार्यालय या कक्ष में पेंटिंग तक सिर्फ़ सरकारी बजट से ही हो सकती है, इसके स्पष्ट शासनादेश काफ़ी पहले से प्रभावी है, तो फिर अख़रि किन परिस्थितियों में आउटसोर्शिंग से धन जुटाकर सजावट करवाई गई और अगर आउटसोर्शिंग इतना सटीक ज़रिया ही है तो क्यूँ नहीं विकास भवन के तमाम कार्यालयों की टपकती छतों का मरम्मतीकरण कराया गया!
बताते चले कि मौजूदा समय में फ़तेहपुर जनपद की सांसद साध्वी निरंजन ज्योति केन्द्र में मन्त्री हैं और हुसैनगंज विधायक रणवेंद्र प्रताप उर्फ़ धुंनी सिंह व जहानाबाद विधायक जय कुमार जैकी प्रदेश की योगी सरकार में मंत्री हैं, बावजूद इसके आउटसोर्शिंग का यह खेल मोदी और योगी के मुँह पर ज़ोरदार तमाचा ही कहाँ जायेगा। धन्य है शासन-सत्ता और उसके सिपह सालार।
उपरोक्त सन्दर्भ में जब ज़िला विकास अधिकारी सुरेश चंद्रा से सम्पर्क किया गया तो उन्होंने बताया कि लगातार दो वर्षों से ज़िला योजना में विकास भवन के मरम्मतीकरण के किये बजट माँगा जा रहा है किंतु एक भी पैसा नहीं मिला तो पूर्व सीडीओ द्वारा कही से व्यवस्था करके अपने कक्ष और सभागार में काम करवाया गया था। उन्होंने विकास भवन की जर्जर पुरानी बिल्डिंग का रोना रोते हुए इस मामले में किसी भी तरह की अपनी सहभागिता से इंकार किया।


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