मंत्र की उपयोगिता जांचें साधना से पहले


किसी शुभ मुहूर्त में नित्य कर्म से निवृत्त होकर मंत्र को ताड़पत्र या भोजपत्र पर लिखकर चांदी के पात्र में इष्टदेव के सामने पाटी पर रखें। फिर उसकी षोडशोपचार से पूजा करें। इसके बाद अपने इष्टदेव का ध्यान करके उनसे मंत्र ग्रहण करें। तत्पश्चात उसी समय उस मंत्र की एक माला का जप करें। मंत्र में जितने अक्षर होते हैं, उसकी उतने ही लाख की जप-संख्या होती है। कम से कम सवा लाख जप अवश्य करना चाहिए। यदि यह भी न हो सके तो ग्यारह हजार से कम में पुरश्चरण नहीं होता। जप का दशांश हवन, हवन का दशांश तर्पण और तर्पण का दशांश ब्राह्मण या साधु को भोजन कराना अनिवार्य है।


कुलाकुल चक्र


मंत्र शास्त्रों में साधक को परामर्श दिया गया है कि वह किसी मंत्र की साधना करने से पूर्व यह निर्णय कर ले कि वह मंत्र उसके लिए उपयोगी है या नहीं? इसको देखने के लिए कुलाकुल चक्र का प्रयोग किया जाता है। साधक तंत्र से संबंधित जिस मंत्र की साधना करना चाहता है, उस मंत्र का पहला अक्षर और साधक के नाम का पहला अक्षर यदि दोनों एक ही कुल के हों अर्थात एक तत्त्व के हों तो वह मंत्र निश्चित रूप से उसे लाभ कराने वाला होता है। क्योंकि मंत्र और मंत्र गृहीता – दोनों की प्रकृति में समानता होती है। यदि इन दोनों के पहले अक्षरों की एक ही प्रकृति न हो अर्थात यह अलग-अलग प्रकृति के हों तो तत्त्व मैत्री चक्र में यह देखना चाहिए कि इन तत्त्वों में आपस में शत्रुता तो नहीं है। यदि उनमें परस्पर शत्रुता हो तो ऐसे मंत्र की साधना नहीं करनी चाहिए क्योंकि इसका फल अच्छा नहीं होगा। कुलाकुल चक्र की रचना के लिए 'अ' से 'क्ष' तक के पचास वर्णों को पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश-पांच तत्त्वों में बांटा गया है। इन पांचों तत्त्वों में पृथ्वी, जल आदि तत्त्वों की आकाश तत्त्व के साथ मैत्री है। वायु तत्त्व का पृथ्वी तत्त्व, अग्नि तत्त्व के जल और पृथ्वी तत्त्व तथा अग्नि तत्त्व के जल तत्त्व और पृथ्वी तत्त्व शत्रु हैं। जैसे एक ही कार्य के लिए अनेक उपाय होते हैं और एक ही बीमारी के लिए कई प्रकार की दवाएं होती हैं, वैसे ही एक साधना के लिए अनेक प्रकार के मंत्र प्राप्त होते हैं। इसलिए यह चिंता नहीं करनी चाहिए कि मंत्र निर्णय कैसे होगा? तंत्र-मंत्र साधकों के लिए यह बात स्मरण रखने योग्य है कि कुछ मंत्र स्वयं सिद्ध कहे जाते हैं। उनके बारे में कुलाकुल चक्र का विचार नहीं किया जाता। 


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