आरईएस में अंधेरगर्दी-02

दीवानी कोर्ट के अर्धनिर्मित भवन को डेढ़ वर्ष से है डीएम के निर्णय का इंतजार...!
सरकारी कार्यदाई संस्था में हो रहा शासनादेश के विपरीत काम
40 लाख के मानक से मीलों दूर निकल जाते है जेई
वीवी पैड भवन के निर्माण में भी खेल की तैयारी
फतेहपुर।


सरकारी कार्यदाई संस्था आरईएस के क्रिया कलाप अबूझ पहेली बने हुए है! स्थानीय दीवानी न्यायालय परिसर के एक अर्धनिर्मित भवन को पिछले लगभग डेढ़ वर्षों से डीएम की तकनीकी समिति का इंतजार है। लगभग बीस लाख की लागत से ग्रामीण अभियंत्रण सेवा (आरईएस) द्वारा अधिवक्ताओ के बैठने के लिये बनवाये जा रहे इस भवन के निर्माण पर तत्कालीन जिला जज ने सशर्त रोक लगा दी थी, जिसके बाद से यह मामला योगीराज में हो रही अंधेरगर्दी का पर्याय बना हुआ है!
उल्लेखनीय है कि लगभग दो वर्ष पूर्व आरईएस को एक माननीय की निधि से बीस लाख रुपये अधिवक्ताओ के बैठने के लिये भवन बनाने के लिए मिले थे। इस कार्यदाई संस्था ने दीवानी न्यायालय परिसर के एक पुराने भवन के ऊपर ही नियम विरुद्ध ढंग से निर्माण शुरू करा दिया, जिसपर तत्कालीन जिला जज ने निर्माण कार्य में प्रयुक्त सामाग्री की गुणवत्ता पर प्रश्न चिन्ह लगते हुए न सिर्फ निर्माण रुकवा दिया बल्कि बाकायदे डीएम को पत्र भेजकर इसकी जाँच कराने और पीडबल्यूडी के इंजीनियरों से उस पुराने भवन के बाबत इस मद की रिपोर्ट माँगने के निर्देश दिये कि “क्या जिस भवन के ऊपर नया निर्माण हो रहा है, वह इतना भार वहन करने की स्थिति में है।”
बताते चलें कि जिस समय तत्कालीन डीजे ने निर्माण कार्य रुकवाया था उस समय स्लेप (छत) ढालने की तैयारी चल रही थी। डीजे के पत्र के बाद आरईएस के जिम्मेदारो के हाथ-पैर फूल गये और बैकडेट में कुछ कागजी खानापूर्ति का प्रयास किया गया किंतु इसमें बहुत ज्यादा सफलता हाथ नहीं लगी। बावजूद इसके कार्य कर रही बाहरी फर्म को काफी कुछ रनिंग पेमेंट जरूर कर दिया गया!क्योंकि पूर्व डीजे ने पत्र डीएम को लिखा था और डीएम स्तर से इस मामले में आरईएस या पीडबल्यूडी को कोई निर्देश नहीं दिया गया, इसलिये अब तक मामला वही का वही पड़ा हुआ है। लगभग डेढ़ वर्ष होने को है डीएम के स्तर से तकनीकी रिपोर्ट के बाबत समिति तक न बनाया जाना योगीराज में अंधेरगर्दी का जीता जागता उदाहरण है!
इस मामले में जानकारो का मत है कि ऐसे मामलों में आरईएस के साथ साथ डीआरडीए की भी बराबर की जिम्मेदारी बनती है कि वह सरकारी धन का उपभोग निहित व्यवस्था व दिशा निर्देशों के मुताबिक कराये। क्योंकि सांसद व विधायक निधि का उपयोग सिर्फ नये कामों पर ही किया जा सकता है, ऐसे में दीवानी न्यायालय के पुराने जर्जर भवन के ऊपर बगैर तकनीकी विशेषज्ञों की रिपोर्ट के नया निर्माण किन परिस्थितियों में हुआ, यह अपने आप में बड़ी जाँच का विषय है! इस मामले में डीआरडीए के पीडी ने जहाँ चुप्पी साध रखी है, वही आरईएस के अधिशासी अभियंता उपलब्ध नहीं हुए।
आरईएस की नियमावली के मुताबिक इस कार्यदाई संस्था के किसी भी अवर अभियंता को एक वर्ष में अधिकतम 40 लाख का ही कार्य सौंपा जा सकता है! बावजूद इसके यहाँ के अधिकांश जेई इस समयावधि में कई कई करोड़ का काम करते रहे है। नतीजतन सम्बंधित निर्माण कार्य ठेकेदार के ही भरोसे रहता है। दूलापुर के बाद असोथर के सामुदायिक मिलन केन्द्र भवन का निर्माण के समय ही गिरने के पीछे अवर अभियंताओ पर काम का अतिरिक्त बोझ भी कहा जा सकता है! इस संदर्भ में भी विभागीय जिम्मेदार कुछ भी बोलने को तैयार नहीं है। बावजूद इसके आरईएस अपनी क्षमता से कही अधिक काम लेता रहा है, जिसको लेकर कई मौकों पर उसकी काफी फजीहत भी होती रही है।
अभी हाल में सीएमओ कार्यालय से आरईएस को मिले लगभग एक करोड़ तीस लाख का मामला भी काफी गर्म है। इसके अलावा कलेक्ट्रेट परिसर में ईवीएम भण्डार ग्रह (वीवी पैड भवन) की दूसरी मंजिल के निर्माण के लिये लगभग सवा करोड़ की धनराशि इसी कार्यदाई संस्था को अवमुक्त हुई है, जिसके लिये मँगाई गई ईंटों की गुणवत्ता से पता चलता है कि निर्माण का स्तर क्या होने वाला है! बड़ी बात यह है कि यह निर्माण कार्य डीएम चेंबर से कुछ ही दूरी पर होना है। यानी डीएम की आँखों के नीचे इस बार बड़े खेल की तैयारी है...!


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