बच्चों में तीन साल से कम अंतर से एनीमिया की शिकार हो जाती है महिला

लखनऊ।


मातृ एवं शिशु मृत्यु दर को कम करने के लिए यह बहुत ही जरूरी है कि दो बच्चों के जन्म में कम से कम तीन साल का अंतर रखा जाये, ऐसा न करने से महिलाओं की गर्भावस्था में जोखिम बढ़ जाता है और बच्चे के कुपोषित होने की भी पूरी संभावना रहती है। बच्चों के जन्म में तीन साल से कम अंतर रखने वाली करीब 62 फीसद महिलाएं एनीमिया की गिरफ्त में आ जाती हैं। इसी तरह दो साल से कम अंतराल पर जन्मे बच्चों में शिशु मृत्यु दर का प्रतिशत भी अधिक है। यह जानकारी निदेशक परिवार कल्याण डॉ॰ बद्री विशाल ने आज यहाँ एक स्थानीय होटल में सेंटर फॉर एडवोकेसी एंड रिसर्च (सीफॉर) के सहयोग से युवा दम्पतियों में बच्चों के बीच अंतर और गर्भधारण में देरी के महत्व की अवधरणा को मजबूत करने के लिए आयोजित मीडिया कार्यशाला के दौरान दी।
इस अवसर पर संयुक्त निदेशक परिवार कल्याण डॉ॰ वीरेंद्र सिंह ने कहा कि उत्तर प्रदेश की कुल किशोर जनसंख्या  करीब 4.89 करोड़ है और जागरूकता के अभाव में बड़ी संख्या में किशोरावस्था में ही विवाह हो रहा है। ऐसे में किशोरियों को उच्च जोखिम वाली गर्भावस्था का सामना करना पड़ता है, जो कि मातृ एवं शिशु मृत्यु का प्रमुख कारण भी बनता है। इसलिए सही मायने में मातृ एवं शिशु मृत्यु दर पर काबू पाने के लिए किशोर वर्ग को परिवार नियोजन की जानकारी देना जरूरी है। परिवार नियोजन की जानकारी होने से लड़कियों के स्कूल छोड़ने, महिलाओं के कार्यस्थल छोड़ने जैसी समस्याओं पर काबू हो सकेगा। इससे जहां वित्तीय लाभ होगा वहीं जीवन की गुणवत्ता में भी सुधार होगा। इसके साथ ही महिलाएं अपनी इच्छा से गर्भधारण का अवसर मिलने से समाज में समान दर्जा हासिल करने में भी सक्षम हो सकेंगी।
डॉ॰ वीरेंद्र सिंह ने कार्यशाला में बताया कि राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे-4 (एनएफएचएस-4) के आंकड़ों के अनुसार करीब 57 फीसद महिलाओं और उतने ही पुरुषों का मानना है कि एक आदर्श परिवार में दो या उससे कम बच्चे होने चाहिए। देश के सात राज्यों के 145 जिले उच्च प्रजनन की श्रेणी में चिन्हित किए गए हैं जिसमें 57 जिले उत्तर प्रदेश के हैं, जिनकी कुल प्रजनन दर तीन या तीन से अधिक है। यह जिले मातृ मृत्यु का 30 फीसद और शिशु मृत्यु का 50 फीसद कारण बनते हैं।
वरिष्ठ परिवार नियोजन विशेषज्ञ, सिफ्सा डा. अरुणा नारायण ने कहा कि परिवार के  साथ-साथ सभी विभागों की जिम्मेदारी बनती है कि महिलाओं को उनकी अपनी देखभाल करने को लेकर जागरूक करें ताकि वह स्वयं के लिए निर्णय ले सके। इसके लिए मीडिया एक सशक्त माध्यम है जो समुदाय को जागरूक कर सकती है ।
उत्तर प्रदेश राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन, परिवार नियोजन की महाप्रबंधक, डॉ॰ अल्पना ने परिवार नियोजन के साधनों की विस्तार से जानकारी दी। इस अवसर पर किंग जार्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय की प्रोफेसर और सेंटर ऑफ एक्सिलेन्स की समन्वयक डॉ॰ सुजाता देव ने किशोर किशोरियों को स्वयं जागरूक किए जाने पर जोर दिया।
कार्यशाला में उत्तर प्रदेश तकनीकि सहायक इकाई (यूपीटीएसयू), ग्लोबल हेल्थ स्ट्रेटीज (जीएचएस), ममता हेल्थ इंस्टीट्यूट ऑफ मदर एंड चाइल्ड, पोपुलेशन सर्विस इंटेरनेशनल (पीएसआई) व पोपुलेशन फाउंडेशन ऑफ इंडिया (पीएफआई) व पाथ के प्रतिनिधियों ने भी प्रतिभाग किया।


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