मोदी पर नहीं, रघुबर दास पर हमला बोल-बोल कर हेमंत सोरेन ने जीत लिया चुनाव


संजय सक्सेना


झारखंड विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को मिली हार को लेकर हर तरफ हाय−तौबा मची हुई है। सब अपने−अपने तरीके से बीजेपी की हार की समीक्षा कर रहे हैं, खासकर राष्ट्रीय दल का तमगा हासिल किए हुए कांग्रेस-भाजपा की तुलना जारी है। कोई 16 सीटें जीतने वाली कांग्रेस को दस में दस नंबर दे रहा है तो 25 सीटें जीतने वाली बीजेपी का 'जीरो' करार दे रहा है। सबका अपना−अपना नजरिया है तो इस हकीकत को भी नहीं झुठलाया जा सकता है कि झारखंड में कांग्रेस इसलिए जीती, क्योंकि उसने राज्य में अपने कदम मजबूती के साथ जमाने के बजाए दूसरे (जेएमएम) की बैसाखी का सहारा लेना ज्यादा सही समझा, इसीलिए वह आज झारखंड में खड़ी दिखाई दे रही है। सत्ता की भागीदार भी रहेगी। कांग्रेस, वहां के क्षेत्रीय दल 'झारखंड मुक्ति मोर्चा' की बी टीम बनकर रह गई, यह पार्टी के भविष्य के लिए कभी शुभ  संकेत नहीं हो सकते हैं। वहीं बात भारतीय जनता पार्टी की कि जाए तो उसने दूसरों- ऑल झारखंड स्टूडेंट यूनियन, जदयू और एलजेपी की बैसाखी छोड़कर अपने 'पैरों' पर खड़ा होना चाहा, लेकिन उसे मुंह की खानी पड़ी। अपने दम पर खड़ा होने की बजाए वह लड़खड़ा कर ऐसे गिरी कि सत्ता तो गई ही उसका सीएम तक हार गया। ऐसा ही प्रयोग बीजेपी ने हरियाणा में भी किया था। वहां भी एकला चलो का उसका प्रयोग असफल रहा था। यह और बात है कि वहां उसने किसी तरह गठबंधन की सरकार बना ली थी।


खैर, सच्चाई यह भी है कि झारखंड में अपने दम पर बीजेपी सरकार बना लेती तो वह आगे चलकर बिहार और दिल्ली के विधान सभा चुनाव में भी अपने दम पर किस्मत अजमाने की कोशिश करती। गौरतलब है कि बीजेपी आलाकमान अपने दम पर चुनाव जीतने की कोशिश लम्बे समय से करता चला आ रहा है। बीजेपी के इस रूख को लेकर उसके सहयोगी दलों- जनता दल युनाइटेड, अकाली दल, लोक जनशक्ति पार्टी, अपना दल आदि के नेता समय−समय पर नाराजगी भी जताते रहे हैं। झारखंड चुनाव के समय भी ऐसा ही हुआ था। आजसू, जनता दल युनाइटेड और लोकजनशक्ति पार्टी के नेता इस बात से खफा थे कि बीजेपी आलाकमान ने झारखंड चुनाव में गठबंधन धर्म नहीं अपनाया।
दरअसल, भारतीय जनता पार्टी अन्य दलों से हटकर अलग तरह की राजनीति कर रही है। मोदी सरकार अपने और आरएसएस के एजेंडे को पूरा करने में लगी है, जिसमें अक्सर हिन्दुत्व की गूंज भी सुनाई देती है। इसके चलते उसके सहयोगी उसे आंख दिखाने लगते हैं, जिससे सरकार की काफी फजीहत होती है। इसीलिए बीजेपी पूरे देश में अकेले दम पर मैदान मारना चाहती है, लेकिन उसके इरादे परवान नहीं चढ़ पा रहे हैं। इसकी वजह है बीजेपी की राज्य इकाइयों की कार्यशैली। तमाम राज्यों के बीजेपी नेता हाथ पर हाथ रखकर बैठे हैं और मोदी के सहारे जीत की उम्मीद लगाए रहते हैं। इसीलिए जहां केन्द्र में तो अपनी कार्यशैली के चलते मोदी मजबूत हो रहे हैं, मगर राज्य स्तरीय नेताओं की लापरवाही के कारण बीजेपी एक के बाद एक राज्य हारती जा रही है। इसी कड़ी में झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) की अगुवाई में बने जेएमएम− कांग्रेस−आरजेडी गठबंधन ने बीजेपी को करारी शिकस्त देते हुए उसे एक और राज्य की सत्ता से बेदखल कर दिया।
गठबंधन का चेहरा रहे जेएमएम के कार्यकारी अध्यक्ष हेमंत सोरेन को भी इस बात का अहसास था कि बीजेपी की प्रदेश सरकार के कामकाम से जनता खुश नहीं है। इसलिए उन्होंने मोदी को छोड़कर अपना सारा ध्यान रघुबर दास सरकार की नाकामियां गिनाने में लगाया। इसी का नतीजा रहा कि झारखंड का सियासी संग्राम हेमंत सोरेन बनाम नरेंद्र मोदी होने के बजाय हेमंत बनाम रघुबर के इर्द−गिर्द ही सिमटा रहा।
उधर, बीजेपी के राज्य नेता छह महीने पहले हुए लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली बीजेपी को मिली प्रचंड जीत के सपनों में थे। तब प्रदेश की 14 में से 12 सीटें बीजेपी गठबंधन ने जीतकर विपक्ष का सफाया कर दिया था। लोकसभा चुनाव में बीजेपी गठबंधन को 55.29 फीसदी वोट मिले थे और 63 विधानसभा सीटों पर उसे विपक्ष से ज्यादा वोट मिले थे। इसमें बीजेपी को अकेले 58 सीटों पर बढ़त थी। इसी आधार पर झारखंड के मुख्यमंत्री और बीजेपी नेता रघुबर दास अबकी बार 65 पार का नारा दे रहे थे। झारखंड विधानसभा चुनाव में मोदी को निशाना न बनाना हेमंत सोरेन की रणनीति कारगार रही। इसी का नतीजा रहा कि बीजेपी की वोट फीसदी से लेकर सीटें में जबरदस्त कमी आई है। छह महीने के अंदर बीजेपी का वोट करीब 20 फीसदी घट गया। इतना ही नहीं बीजेपी अपनी सीटें भी बचा नहीं पाई और 37 से घटकर 25 पर सिमट गई। बीजेपी की समझदारी इसी में है कि वह अपनी राज्य इकाइयों को मजबूती प्रदान करने के साथ राज्यों की अपनी सरकारों के कामकाज की भी गहन समीक्षा करे। आज स्थिति यह है कि बीजेपी के सांसदों/विधायकों को जनता की चिंता ही नहीं रह गई है। वह मोदी नाम केवल्म के सहारे बैठे हैं।


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