केशवरायपाटन मंदिर


केशवरायपाटन मंदिर का इतिहास
केशवरायपाटन के इतिहास पर नजर डालें, तो आभास होता है कि किसी समय यह बड़ी भव्य नगरी रही होगी। क्योंकि वायु पुराण के अनुसार चौरासी कोस के जंबू भाग के बीच इसका स्थान विस्तार पांच कोस माना गया है। परशुराम जमदग्नि संवाद के बीच इस प्रसंग पर पर्याप्त चर्चा हुई है। यथा हरिवंश पुराण में भी जंबूकाराय और केशवरायपाटन के पुण्य महात्मय पर पर्याप्त प्रकाश डाला गया है। इससे सिद्ध होता है कि केशवराय पाटन में और उसके आसपास कितने ही देवालय खंडहर हुए पड़े हैं और कितने ही समय के साथ भूमि में धंस गए हैं और न जाने कितने ही वर्तमान विकास की भेंट चढ़ गए हैं। केशवरायपाटन की परिधि में मुख्य देवालयों में श्री केशवरायपाटन का मंदिर प्रमुख दर्शनीय स्थल है। चैत्र की पूर्णिमा पर इसका विशाल प्रांगण श्रद्धालुओं से भर उठता है। केशवरायपाटन मंदिर में राव राजा रघुवीर सिंह का विक्रमी सन् 1959 में लगवाया गया एक शिलालेख है। जिसके अनुसार केशवरायपाटन मंदिर का निर्माण बूंदी के राजा राव श्री शत्रुशल्य जी ने सन् 1698 विक्रमी में करवाकर किसी जीर्ण मंदिर से उठाई गई दो प्रतिमाएं इसमें स्थापित की थी। एक प्रतिमा श्री केशवरायजी की, जो श्वेत संगमरमर की है और मुख्य मंदिर में है तथा दूसरी श्री चारभुजा जी की कृष्ण मूर्ति जो परिक्रमा के मंदिर में है। केशवरायपाटन मंदिर विष्णु तीर्थ से ठीक ऊपर नदी तट से दौ सौ फुट की ऊंचाई पर है। जिसमें अंदर बाहर सर्वत्र विविध प्रकार की पशु आकृतियां, मनुष्य आकृतियां, नृत्य मुद्राएं और भगवान श्री कृष्ण संबंधी भागवत कथाएं मूर्ति रूप में उत्कीर्ण है। मंदिर के अंदर की प्रतिमाओं पर चटकीले रंग हैं, जबकि बाहरी दीवारों की प्रतिमाएं बार-बार चूना पोते जाने के कारण दब गई हैं। मंदिर के बीचोंबीच बने गरुड़ ध्वज से संगमरमर की गरुड मूर्ति हाथ जोड़े हुए श्री केशवरायजी को देख रही है। इसी प्रकार पाटन के दक्षिणी छोर पर भगवान सुव्रतनाथ का जैन मंदिर स्थित है। जिसमें जैन तीर्थंकरों की विविध रंग के पत्थरों की कलात्मक प्रतिमाएं हैं। इसके अलावा केशवरायपाटन के दर्शनीय स्थलों में मैत्री के हनुमान का मंदिर नगर के उत्तर पूर्व में लगभग छः फर्लांग की दूरी पर स्थित है। मंदिर को अति प्राचीन शिवालय भी कहा जाता है। जिसमें महावीर जी की स्थापना होल्कर द्वारा की गई बताते हैं। पुराण के अनुसार मैत्रावरुण ऋषि ने इस स्थान पर तप किया था। फिर ब्रह्मा जी यहां श्वेत वाहन पर आरूढ होकर शुभ्ररूप से प्रकट हुए और यज्ञ पूरा होने पर यज्ञकुंड को जल पूर्ण कर शिवलिंग रूप से अवस्थित हुए।


 


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