धरबरनीश्वर मंदिर


पुडुचेरी के तिरुनलार क्षेत्र में बने धरबरनीश्वर मंदिर की मान्यताएं सबसे अलग और अनूठी हैं। कहने को तो ये एक शिव मंदिर है, लेकिन इस शिवालय के द्वार पर पहरेदार के रूप में भगवान शनि विराजित हैं। शिवजी की पूजा के लिए गर्भगृह में प्रवेश से पहले हर किसी को यहां शनि देव की पूजा करना अनिवार्य है। कर्म और न्याय के देवता शनि को भगवान शिव का ही शिष्य माना गया है। इस लिहाज से अपने कर्मों की शांति के लिए यहां पूजा अनिवार्य मानी गई है। धरबरनीश्वर मंदिर दुनिया के प्राचीनतम मंदिरों में से एक है। करीब 1300 साल पुराने इस मंदिर को लेकर कई तरह की मान्यताएं और परंपराएं हैं। इतिहास बताता है कि 7वीं शताब्दी में इस मंदिर की स्थापना हुई थी। तमिल कवि संबम्दार (संभार) के चार भजनों में इस मंदिर का उल्लेख मिलता है, जो 7वीं शताब्दी के आसपास के ही हैं। मंदिर को लेकर कई लोक कथाएं और मान्यताएं हैं। यहां शनि के साथ नवगृह का पूजन भी किया जाता है। तमिलनाडु के 9 मुख्य नवगृह मंदिरों में से एक इस मंदिर को माना जाता है। भगवान शनि की पूजा के लिए यहां लगभग रोज ही भक्तों का बड़ी संख्या में जमावड़ा होता है, लेकिन अढ़ाई साल में एक बार जब शनि अपनी राशि बदलते हैं, तब यहां बड़ी संख्या में लोग आते हैं। इस मंदिर की मान्यता है कि शनि की साढ़ेसाती, ढैय्या और महादशा से पीडि़त लोगों को यहां दर्शन करने चाहिए। इससे शनि से होने वाली समस्याओं का समाधान होता है। तिरुवरूर में त्यागराज मंदिर अजपा थानम (मंत्रोच्चारण के बिना नृत्य) के लिए प्रसिद्ध है, जिसे देवता द्वारा ही किया जाता है।


एक पौराणिक कथा के अनुसार मुचुकुंता नाम के एक चोल राजा ने इंद्र (एक दिव्य देवता) से एक वरदान प्राप्त किया और मंदिर में त्यागराज स्वामी (चित्र देवता, शिव की प्रतिमा) प्राप्त करने की कामना की, जो भगवान विष्णु को याद करने के लिए छाती पर बैठे थे। इंद्र ने राजा को गुमराह करने की कोशिश की और छह अन्य चित्र बनाए, लेकिन राजा ने तिरुवरुर में सही छवि को चुना। अन्य छह चित्र थिरुक्कुवलाई, नागपट्टिनम, तिरुकारायिल, तिरुकोलिली और तिरुमराईकाडु में स्थापित किए गए थे।


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