जीवन का आनंद



दुख हमें बंद कर देता है, जबकि सुख खोलता है। दुखी व्यक्ति अपने चारों ओर कठोर आवरण बनाकर चित्रण की तरह हो जाता है, जबकि एक प्रसन्न व्यक्ति फूल की तरह कोमल होता है, जो खिल कर सारी दुनिया को अपनी खुशबू दे सकता है। दुख से लगाव होना एक रोग है। यह विकृत प्रवृत्ति है। यह प्राकृतिक नहीं है। असल में रचनाशील और सकारात्मक व्यक्ति जीवन का आनंद लेने और रचनात्मक कार्यों में इतना व्यस्त रहता है कि वह दूसरों पर हावी होने की परवाह ही नहीं करता।







जबकि नकारात्मक और प्रतिभाहीन व्यक्ति क्योंकि आनंद नहीं ले सकता, इसलिए वह अपनी सारी ऊर्जा वर्चस्व कायम करने में लगा देता है। जो गा सकता है, वह गाएगा, जो नाच सकता है, वह नाचेगा। सितारों भरे असामान के नीचे उत्सव मनाएगा, लेकिन जो नाच नहीं सकता वह कोने में पड़ा रहेगा और योजनाएं बनाएगा कि दूसरे भी न नाच सकें। जो रचनाशील है, वह रचेगा। जो नहीं रच सकता, वह नष्ट करेगा, क्योंकि उसे भी तो दुनिया को दिखाना है कि वह भी है। जो नकारात्मक हैं, प्रतिभाहीन हैं, जिनमें रचनाशीलता नहीं है, ऐसे सभी लोग वर्चस्व स्थापित करने के मामले में काफी आगे होते हैं। वे हावी रहने के तरीके और जरिये खोज ही निकालते हैं। वे राजनेता बन जाते हैं। पुरोहित बन जाते हैं। क्योंकि जो काम वे खुद नहीं कर सकते, उसे वे दूसरों को भी नहीं करने देना चाहते। इसलिए वे हर तरह की खुशी के खिलाफ होते हैं।


ये लोग एक जगह जमा होकर अपनी बुद्धि लगाते हैं ताकि जोरदार नैतिकता का ढांचा खड़ा कर सकें और फिर उसके आधार पर हर चीज की भर्त्सना कर सकें। बस कुछ न कुछ नकारात्मक खोज निकालना है। जो व्यक्ति प्रेम नहीं कर सकता, वह हमेशा नकारात्मक पर ही जोर देगा। वह हमेशा तुमसे कहेगा, अगर तुम प्रेम में पड़े तो दुख उठाओगे।  तुम्हें तकलीफें भोगनी होंगी और स्वाभाविक रूप से जब भी तुम कभी दुख का सामना करोगे तो तुम्हें वह व्यक्ति याद आएगा कि वह सही कहता था। फिर एक स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है कि मनुष्य रोगों के प्रति ज्यादा सचेत होता है न कि स्वास्थ्य के प्रति। जब स्वस्थ होते हो तो तुम अपने शरीर के बारे में भूल जाते हो, लेकिन जैसे ही सिरदर्द होता है या फिर पेट का दर्द तो देह को नहीं भूल पाते। देह तब प्रमुखता से होती है।


वह तुम्हारा ध्यान खींचती है। जब तुम प्रेम में होते हो और खुश होते हो तो भूल जाते हो, लेकिन जब संघर्ष, नफरत और गुस्सा होता है तो तुम उसे बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने लगते हो। ऊपर से वे नकारात्मक लोग मिलकर चिल्लाते हैं कि देखो, हमने तुमसे पहले ही कहा था और तुमने हमारी नहीं सुनी। प्रेम को त्यागो, प्रेम दुख बनाता है। इन बातों को अगर बार-बार दोहराया जाता है तो उनका असर होने लगता है। लोग उनके सम्मोहन में फंस जाते हैं। तुम कहते हो कि तुम उपवास करते रहे हो, तुमने ब्रह्मचर्य व्रत का पालन किया है।


उपवास और ब्रह्मचर्य का भला बुद्धत्व से क्या ताल्लुक हो सकता है। तुम कहते हो कि मैं बुद्धत्व प्राप्त करने के लिए रात-रात भर जागता रहता हूं, तो दिन में बुद्धत्व प्राप्त करने की कोशिश क्यों नहीं करते? रात भर जागने की क्या जरूरत है? कुदरत के विरोध में तुम क्यों खड़े हुए हो। बुद्धत्व प्रकृति के खिलाफ  नहीं होता। वह प्रकृति की परितृप्ति है। वह तो प्रकृति की चरम अभिव्यक्ति है। जीवन में चाहे सुख हो या दुख हमें कभी निराश नहीं होना चाहिए।



 


 




 





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